बिहार का ऐतिहासिक अईनखांव पशु मेला जहां हर बृहस्पतिवार को लगता हैं लाखों का हुजूम।

साल 1966 ! शायद यह साल आपके स्मरण में नहीं होगा। अगर नहीं हैं तो बहुत अच्छा । भयंकर अकाल का वर्ष था । बिहार दाने दाने को मोहताज था।खैर उसी साल अईनखांव पशु मेला की शुरुआत हुई।आस पास के किसानों को बाजार मिले और लोगों को रोजगार मिले कुछ ऐसा ही उद्देश्य था राघवेन्द्र धारी जी का।तब से अब तक हर बृहस्पतिवार को यह मेला सजता है। तकरीबन पांच सौ किसान अपने पशुओं के साथ हर हफ्ता आते हैं ।बतियाते हैं । सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक चर्चा के बिच खरीद-बिक्री,मोल-भाव चलते रहता है।
शाम ढ़लते ढलते बेचकर भुजां,टेकुआ,जलेबी खाते-खिलाते घर को सरपटिया देते हैं।इस फोटो में जो तंदरुस्त सरदार जी दिख रहें न वही संभाल रहे हैं इस मेले का बागडोर। 2003 से जिम्मेदारी निभा रहे हैं। कहते हैं दिनो दिन ईस मेले की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है।अब तो दुर दुर से व्यापारी आते है। उड़िसा, बंगाल सब जगह सें। हर मेले में पचास से साठ लाख का लेन देन होता है पर कुछ सरकारी सुरक्षा व्यवस्था नहीं है।हो जाये तो मजा आ जायेगा। मेले में प्रतियोगिता वगैरह नही होता हैं।होना चाहिए।

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