गांव, किसान, जल और जमीन का महापर्व छठ की महानता जान हैरान रह जाएंगे आप।

ग्रामीण जीवन का यह सबसे बड़ा पर्व माना गया है। इसके केन्द्र में कृषि, मिट्टी और किसान हैं। धरती से उपजी हुई हर फसल और हर फल-सब्जी इसका प्रसाद है। मिट्टी से बने चूल्हे पर और मिट्टी के बर्तन में नहाय-खाय, खरना और पूजा का हर प्रसाद बनाया जाता है। बांस से बने सूप में पूजन सामग्री रखकर अर्घ्य दिया जाता है। एक जगह का सामान दूसरी जगह भेजा जाता है। इस संबंध में एक गीत है….
पटना के घाट पर नारियर किनबे जरूर
हाजीपुर से केरवा मंगाई के अरघ देबे जरूर
हियरा के करबो रे कंचन
पांच पुतर, अन-धन, लक्ष्मी मंगबे जरूर…..।जल ही जीवन है…
प्रदूषण के खतरों से बचाती है छठ
आज पूरी दुनिया में जल और पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। बिहार ने सदियों पूर्व इसके महत्व को समझा और यही कारण है कि छठ पर्व पर नदी घाटों और जलाशयों की सफाई की जाती है तथा जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य की छाया पानी में साफ-साफ दिखाई पड़नी चाहिए। संदेश साफ है कि जल को इतना निर्मल और स्वच्छ बनाइए कि उसमें सूर्य की किरणें भी प्रतिबिंबित हो उठे। मौजूदा दौर में जल प्रदूषण प्राणियों के जीवन के लिए एक बड़ा खतरा माना जा रहा है।छठ सूर्य की पराबैगनी किरणों को अवशोषित कर उसके हानिकारक प्रभावों से बचाती है। वैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को धरती की सतह पर सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणें मानक से अधिक मात्रा में टकराती हैं। लोग जल में खड़े होकर जब सूर्य को अर्घ्य देते हैं तो वे किरणें अवशोषित होकर आक्सीजन में परिणत हो जाती हैं, जिससे लोग उन किरणों के कुप्रभावों से बचते हैं। तभी तो प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा हो पाती है और हम चुस्त-दुरुस्त दिखते हैं।ग्रामीण जीवन का यह सबसे बड़ा पर्व माना गया है। इसके केन्द्र में कृषि, मिट्टी और किसान हैं। धरती से उपजी हुई हर फसल और हर फल-सब्जी इसका प्रसाद है। मिट्टी से बने चूल्हे पर और मिट्टी के बर्तन में नहाय-खाय, खरना और पूजा का हर प्रसाद बनाया जाता है। बांस से बने सूप में पूजन सामग्री रखकर अर्घ्य दिया जाता है। एक जगह का सामान दूसरी जगह भेजा जाता है। इस संबंध में एक गीत है….
पटना के घाट पर नारियर किनबे जरूर
हाजीपुर से केरवा मंगाई के अरघ देबे जरूर
हियरा के करबो रे कंचन
पांच पुतर, अन-धन, लक्ष्मी मंगबे जरूर…..।छठ सूर्य की पराबैगनी किरणों को अवशोषित कर उसके हानिकारक प्रभावों से बचाती है। वैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को धरती की सतह पर सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणें मानक से अधिक मात्रा में टकराती हैं। लोग जल में खड़े होकर जब सूर्य को अर्घ्य देते हैं तो वे किरणें अवशोषित होकर आक्सीजन में परिणत हो जाती हैं, जिससे लोग उन किरणों के कुप्रभावों से बचते हैं। तभी तो प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा हो पाती है और हम चुस्त-दुरुस्त दिखते हैं।

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